राजा परीक्षित ने स्वयं का अपमान समझकर मृत सर्प को क्रमिक मुनी के गले में डाला

राजा परीक्षित ने स्वयं का अपमान समझकर मृत सर्प को क्रमिक मुनी के गले में डाला
परीक्षित जन्म, सुखदेव आगमन की कथा 

सिहोरा

बस स्टैंड गांधीग्राम पुरानी सेंट्रल बैंक के पीछे  चल रहे संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में द्वतीय दिवस परीक्षित जन्म की कथा  सुनाते हुए पौराणिक राघवेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि  अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा, जो राजा विराट की पुत्री थी। वह अभिमन्यु को ब्याही गई थी। युद्ध में गुरु द्रोण के मारे जाने से क्रोधित होकर उनके पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। लेकिन वे पांडव ना होकर द्रोपदी के पांच पुत्र थे। जानबूझकर चलाए गए इस अस्त्र से उन्होंने उत्तरा को अपना निशाना बनाया। अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा उस समय गर्भवती थी। बाण लगने से उत्तरा का गर्भपात हुआ और गर्भपात होने से परीक्षित का जन्म हुआ। वे जब 60 वर्ष के थे एक दिन वे क्रमिक मुनि से मिलने उनके आश्रम गए। उन्होंने उन्हें आवाज लगाई लेकिन तप में लीन होने के कारण मुनि ने प्रति उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित स्वयं का अपमान मानकर निकट मृत पड़े सर्प को क्रमिक मुनि के गले में डाल दिया और वहां से चले गए। अपने पिता के गले में मृत सर्प को देख मुनि के पुत्र ने श्राप दे दिया कि जिस किसी ने भी मेरे पिता के गले में मृत सर्प डाला है। उसकी मृत्यु 7 दिनों के अंदर सांप के डसने से हो जाएगी। ऐसा ज्ञात होने पर राजा परीक्षित ने विद्वानों को अपने दरबार में बुलाया और उनसे राय मांगी। उस समय विद्वानों ने उन्हें सुखदेव का नाम सुझाया और इस प्रकार सुखदेव का आगमन हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण की आरती पौराणिक राघवेंद्र त्रिपाठी के सानिध्य में आयोजक श्रीमती रमा त्रिपाठी, नीरज, पुष्पा त्रिपाठी, श्रीकृष्ण कुमार शास्त्री, मुन्ना, सुरेंद्र, महेंद्र, नरेन्द्र, श्रीमती राधा, रजनी, आशा, उषा ,मंजू ,अंजू आदि भक्तों द्वारा की गई।
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