डा.पी डी महंत सकरी महाविद्यालय द्वारा प्रेमचंंद की 142 वी जयंती पर विशेष

कलम का सिपाही ,अपने कलम के भरोसे आज भी जिंदा है

(मुंशी प्रेमचंद की 142वीं जयंती 31जुलाई 2022पर विशेष कफ़न के संदर्भ में)
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वाराणसी उत्तर प्रदेश के सुनाम धन्य गांव लमही में 31जुलाई सन् 1880को जन्मे मुंशी प्रेमचंद का आज 142वी जयंती पर्व है।उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।उनके साहित्य  आज भी प्रासंगिक हैं,वे अपनी रचनाओं के माध्यम से आज भी जिंदा हैं,आज के 21वीं शताब्दी के  आधुनिक युग में भी रचनाकार यथार्थ जीवन और सादगी पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा है।वहीं दिखावटी पन से दूर रहने  और कुरीति,आडंबर का विरोध करने की सीख दे रहे हैं।
हिंदी साहित्य का सुप्रसिद्ध साहित्यकार की कहानी कफ़न की मौलिकता और आज के जीवन में प्रासंगिकता पर एक दृष्टि डालते हैं।

कहानी में केवल 3ही पात्र हैंघीसू,माधव और बुधिया,।माधव की बीबी है बुधिया और घीसू उसके बाप।प्रसव..वेदना से तड़प रही है, बुधिया,प्रकृति का सन्नाटा और रात का समय,साधन विहीन ,गरीब समाज  जिसके पास ईलाज के लिए पैसे नहीं!!!और अशिक्षा के कारण  अलाल जिंदगी,कामचोरी ने बाप और बेटे दोनो को कामचोर के साथ नशाखोर बना के रख दिया है, ऐसे में कहानी कफ़न आज के जन जीवन को भी प्रभावित कहीं न कहीं करते चलता है,एक प्रेरणा देता है,कर्म करने की। कहानीकार शब्द चयन का कुछ अंश देखिए कि किस तरह का समाज था,...
   "जिस समाज में रात -दिन मेहनत करनेवालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुकाबले में वे लोग,जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे,कहीं ज्यादा संपन्न थे,वहां इस तरह की मनो वृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी।"
        आज भी किसानों का कई रूप से दोहन,शोषण,बिचौलिए लोगों के बीच खुले आम हो रहा है,सब जानते हुवे भी हम चुप ,मौन बैठे हैं,।मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में तो किसान की हालात आज भी प्रासंगिक बन जाते है।
कफ़न कहानी की परिस्थिति जन्य दृश्य को प्रेमचंद बड़े ही सादगी से इस तरह रखते हैं,कहानी की शुरुवात ही ऐसी होती है,...
"झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बूझे हुवे अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुवे हैं और अंदर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव - वेदना से पछाड़ खा रही थी।रह - रह कर उसके मुंह से ऐसी दिल  हिला देनेवाली आवाज निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी,प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई,सारा गांव अंधकार में लय हो गया था।""
      कहानीकार प्रेमचंद ने प्रकृति के साथ साथ जीवन की बेबसी,लाचारी,दुर्दशा,गरीबी सब को एक साथ "अंधकार मय "बना दिया है,जो कि मानव हृदय   की मार्मिकता को सहजता से स्पर्श करता है।
            कहानी आगे बढ़ता है...और सुबह सुबह बुधिया कोठरी में ठंडी हो गई थी,उसके मुंह पर मक्खियां भिनक रही थी।पथराई हुई आंखें ऊपर टंगी हुई थी।उसके पेट में बच्चा मर गया था।"और इसी के साथ मानव के जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा के रूप में "कफ़न""(मृत्यु के बाद ओढ़ाया जाने वाला कपड़ा जिसे छतीसगढ़ी में नवादशी कहते हैं)की जरूरत पड़ती है,कफ़न के लिए भी घीसु को भीख मांगना पड़ा।और कहानीकार के शब्दों से ये पीड़ा  किस रूप में प्रकट होती है,देखते बनता है..."कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते -जी तन ढकने को चीथड़ा भी न मिले,उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए, कफ़न लाश के साथ ही तो जल जाता है।""
        अंतिम क्रिया कर्म और मानव जीवन की नश्वरता को साहित्यकार प्रेमचंद ने कहानी कफ़न में इस तरह अभिव्यक्त किया है.."हां बेटा,बैकुंठ में जाएगी।किसी को सताया नहीं,किसी को दबाया नहीं।मरते -मरते हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई।वह न बैकुंठ में जाएगी तो क्या ये मोटे -मोटे लोग जायेंगे जो गरीबों को दोनो हाथों से लूट ते हैं और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं!!"
        कहानी छोटी है,पर मार्मिक प्रभाव छोड़ता हैं,मानव जीवन की विवशता ,नश्वरता, अभाव के साथ नारी जाति की दुर्दांत पीड़ा को नई अभिव्यक्ति देता यह कहानी,कफ़न आज भी प्रासंगिक हैं,खासकर छत्तीसगढ़ के बस्तर,सरगुजा,कोरबा और भी पहाड़ी इलाके जहां आज भी कोसों दूर  कांवर  से  मरीजों को अस्पताल लाए जाते हैं,और अभाव में जिंदगी अधूरी ही रह जाती है।
 प्रेमचंद मानव  जीवन के यथार्थ रचना कार को आज हम उनके  एक छोटी सी कहानी के माध्यम से जयंती पर्व पर याद कर रहे हैं,सुधि पाठकों के साथ उन्हें सच्ची विनम्र पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
                प्रोफेसर डॉ फूल दास महंत
              9109374444कलम का सिपाही ,अपने कलम के भरोसे आज भी जिंदा है

(मुंशीकलम का सिपाही ,अपने कलम के भरोसे आज भी जिंदा है

(मुंशी प्रेमचंद की 142वीं जयंती 31जुलाई 2022पर विशेष कफ़न के संदर्भ में)
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वाराणसी उत्तर प्रदेश के सुनाम धन्य गांव लमही में 31जुलाई सन् 1880को जन्मे मुंशी प्रेमचंद का आज 142वी जयंती पर्व है।उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।उनके साहित्य  आज भी प्रासंगिक हैं,वे अपनी रचनाओं के माध्यम से आज भी जिंदा हैं,आज के 21वीं शताब्दी के  आधुनिक युग में भी रचनाकार यथार्थ जीवन और सादगी पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा है।वहीं दिखावटी पन से दूर रहने  और कुरीति,आडंबर का विरोध करने की सीख दे रहे हैं।
हिंदी साहित्य का सुप्रसिद्ध साहित्यकार की कहानी कफ़न की मौलिकता और आज के जीवन में प्रासंगिकता पर एक दृष्टि डालते हैं।

कहानी में केवल 3ही पात्र हैंघीसू,माधव और बुधिया,।माधव की बीबी है बुधिया और घीसू उसके बाप।प्रसव..वेदना से तड़प रही है, बुधिया,प्रकृति का सन्नाटा और रात का समय,साधन विहीन ,गरीब समाज  जिसके पास ईलाज के लिए पैसे नहीं!!!और अशिक्षा के कारण  अलाल जिंदगी,कामचोरी ने बाप और बेटे दोनो को कामचोर के साथ नशाखोर बना के रख दिया है, ऐसे में कहानी कफ़न आज के जन जीवन को भी प्रभावित कहीं न कहीं करते चलता है,एक प्रेरणा देता है,कर्म करने की। कहानीकार शब्द चयन का कुछ अंश देखिए कि किस तरह का समाज था,...
   "जिस समाज में रात -दिन मेहनत करनेवालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुकाबले में वे लोग,जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे,कहीं ज्यादा संपन्न थे,वहां इस तरह की मनो वृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी।"
        आज भी किसानों का कई रूप से दोहन,शोषण,बिचौलिए लोगों के बीच खुले आम हो रहा है,सब जानते हुवे भी हम चुप ,मौन बैठे हैं,।मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में तो किसान की हालात आज भी प्रासंगिक बन जाते है।
कफ़न कहानी की परिस्थिति जन्य दृश्य को प्रेमचंद बड़े ही सादगी से इस तरह रखते हैं,कहानी की शुरुवात ही ऐसी होती है,...
"झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बूझे हुवे अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुवे हैं और अंदर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव - वेदना से पछाड़ खा रही थी।रह - रह कर उसके मुंह से ऐसी दिल  हिला देनेवाली आवाज निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी,प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई,सारा गांव अंधकार में लय हो गया था।""
      कहानीकार प्रेमचंद ने प्रकृति के साथ साथ जीवन की बेबसी,लाचारी,दुर्दशा,गरीबी सब को एक साथ "अंधकार मय "बना दिया है,जो कि मानव हृदय   की मार्मिकता को सहजता से स्पर्श करता है।
            कहानी आगे बढ़ता है...और सुबह सुबह बुधिया कोठरी में ठंडी हो गई थी,उसके मुंह पर मक्खियां भिनक रही थी।पथराई हुई आंखें ऊपर टंगी हुई थी।उसके पेट में बच्चा मर गया था।"और इसी के साथ मानव के जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा के रूप में "कफ़न""(मृत्यु के बाद ओढ़ाया जाने वाला कपड़ा जिसे छतीसगढ़ी में नवादशी कहते हैं)की जरूरत पड़ती है,कफ़न के लिए भी घीसु को भीख मांगना पड़ा।और कहानीकार के शब्दों से ये पीड़ा  किस रूप में प्रकट होती है,देखते बनता है..."कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते -जी तन ढकने को चीथड़ा भी न मिले,उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए, कफ़न लाश के साथ ही तो जल जाता है।""
        अंतिम क्रिया कर्म और मानव जीवन की नश्वरता को साहित्यकार प्रेमचंद ने कहानी कफ़न में इस तरह अभिव्यक्त किया है.."हां बेटा,बैकुंठ में जाएगी।किसी को सताया नहीं,किसी को दबाया नहीं।मरते -मरते हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई।वह न बैकुंठ में जाएगी तो क्या ये मोटे -मोटे लोग जायेंगे जो गरीबों को दोनो हाथों से लूट ते हैं और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं!!"
        कहानी छोटी है,पर मार्मिक प्रभाव छोड़ता हैं,मानव जीवन की विवशता ,नश्वरता, अभाव के साथ नारी जाति की दुर्दांत पीड़ा को नई अभिव्यक्ति देता यह कहानी,कफ़न आज भी प्रासंगिक हैं,खासकर छत्तीसगढ़ के बस्तर,सरगुजा,कोरबा और भी पहाड़ी इलाके जहां आज भी कोसों दूर  कांवर  से  मरीजों को अस्पताल लाए जाते हैं,और अभाव में जिंदगी अधूरी ही रह जाती है।
 प्रेमचंद मानव  जीवन के यथार्थ रचना कार को आज हम उनके  एक छोटी सी कहानी के माध्यम से जयंती पर्व पर याद कर रहे हैं,सुधि पाठकों के साथ उन्हें सच्ची विनम्र पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
                
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