दीपावली की रात आने वाली विपत्तियों को दूर करने छाहुर लेकर ग्वालो ने गाई और नाची दिवारी

दीपावली की रात आने वाली विपत्तियों को दूर करने छाहुर लेकर ग्वालो ने गाई और नाची दिवारी


सिहोरा 

ऐसी मान्यता है कि दिवारी गाने वाले ग्वाले हाथ में छाहुर लेकर नाचते हैं और गांव पर आने वाली विपत्तियों को दूर करने की कामना करते हैं। दिवारी को अहीर नृत्य व गायन भी कहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह परंपरा अभी भी कायम है लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है। अलग-अलग स्थानों पर इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में राउत कहते हैं तो बुंदेलखंड में अहीर, बरेदी, ग्वाल नृत्य व गायन कहा जाता है। निमाड़ में ठाठ्या तो मालवा में कानगुवालिया कहा जाता है। अहीर या दिवारी गाने वाले ग्वाले यानी यादव समाज के लोग होते हैं। जिन्हें शहर के आसपास स्थानीय बोली में अहीर भी कहते हैं, इसलिए इसे अहीर नृत्य व गायन कहते हैं।

अहीर रंग-बिरंगे ऊन की बनी छाहुर हाथ में लेकर और ऊन से बने ही कपड़े पहनकर दिवारी गाने निकलते हैं। आई दिवारी पाहुनी, लाई दीया में तेल, माई चंडी आ गई रहे, अब काहे की देर...। इस तरह के दोहों के साथ अहीरों का यह समूह अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र मृदंग, ढोलक, थाली, लोटा, घंटा, मंजीरा के साथ गांव के हर घर में जाकर दिवारी गाता है।
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