कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज के युग में कहीं नहीं : पंडित इंद्रमणि त्रिपाठी

कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज के युग में कहीं नहीं :  पंडित इंद्रमणि त्रिपाठी


शिवमंदिर बाबाताल में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा श्रीकृष्ण कथामृत महोत्सव

सिहोरा

  श्रीमद् भागवत कथा का सात दिनों तक श्रवण करने से जीव का उद्धार हो जाता है तो वहीं इसे कराने वाले भी पुण्य के भागी होते है। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज के युग में कहीं नहीं है। उक्त प्रवचनों की अमृतवर्षा व्यासपीठ से पंडित इंद्रमणि त्रिपाठी ने श्री शिवमंदिर बाबाताल में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा श्रीकृष्ण कथामृत महोत्सव के अंतिम दिवस व्यक्त किए।

पंडित इंद्रमणि त्रिपाठी ने कहा कि एक बार की बात श्रीकृष्ण और सुदामा संदीपन के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उसी समय माता ने दोनों मित्रों से खाना बनाने के लिए जंगल से कुछ लकड़ी लाने को कहा। दोनों मित्र जंगल से लकड़ी लेने जा रहे थे। तभ जंगल में अचानक बरसात होने लगी। भूख लगने पर माता ने सुदामा के लिए कुछ चने दिये थे और कहा जब भी भूख लगे पर दोनों एक साथ खा ले, लेकिन माता के दिये हुए चने को सुदामा जी अकेले ही खा गये। सुदामा जी के पास कृष्ण नाम का धन था। संसार की दृष्टि में सुदामा गरीब तो थे लेकिन दरिद्र नहीं थे। अपने जीवन में किसी से कुछ मांगा नहीं। पत्नी सुशीला के बार-बार कहने पर सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने गए।जब वह महल के गेट पर पहुंच जाते हैं, तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बताते है और अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उपहास उड़ाते हैं। कहते है कि भगवान श्रीकृष्ण का मित्र एक दरिद्र व्यक्ति कैसे हो सकता है। प्रहरियों की बात सुनकर सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगते हैं। इसी समय एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर एक सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और अपने आप को आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं।
Previous Post Next Post
Wee News