रायगढ़ रायपुर | छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से शुरू हुआ नकली दवाओं का यह मामला अब राजधानी की सरकारी लैब की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। लीवर और पथरी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली उसोंडियोक्सीकोलिक एसिड टैबलेट को लेकर दो विरोधाभासी रिपोर्ट सामने आई हैं। जहाँ एक ओर रायपुर की सरकारी खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला ने इस दवा को जांच में पास कर मानक स्तर का बताया है वहीं दूसरी ओर मूल निर्माता कंपनी सन फार्मा ने इसे सिरे से नकारते हुए जाली करार दिया है। इस खुलासे के बाद अब दवा के असली स्रोत का पता लगाने के लिए कड़ियां जोड़ी जा रही हैं लेकिन जांच लखनऊ में जाकर अटक गई है।
लखनऊ से जबलपुर होते हुए रायगढ़ पहुंची खेप
दवाओं की सप्लाई चैन का रिकॉर्ड बताता है कि यह टैबलेट रायगढ़ के सुधीर केमिस्ट नामक स्टोर्स पर उपलब्ध थी। रिकॉर्ड के मुताबिक दुकानदार के पास 300 स्ट्रिप दवा थी जिसकी अनुमानित कीमत 5 से 6 लाख रुपए है। सुधीर केमिस्ट ने यह दवा जबलपुर की हर्ष फार्मा से खरीदी थी जबकि हर्ष फार्मा को इसकी सप्लाई लखनऊ की ए फार्मा नामक फर्म से हुई थी। फिलहाल लखनऊ के आगे यह दवा कहाँ से आई और इसका असली निर्माता कौन है इसका कोई सुराग हाथ नहीं लगा है।
कंपनी ने पकड़ी सात बड़ी गलतियां
जब ड्रग इंस्पेक्टर ने अगस्त 2025 में सैंपल लेकर जांच के लिए सन फार्मा कंपनी को भेजा तो कंपनी ने 15 अलग अलग बिंदुओं पर इसका भौतिक सत्यापन किया। रिपोर्ट में पाया गया कि 15 में से 7 प्रमुख बिंदुओं पर यह टैबलेट कंपनी के मानकों से मेल नहीं खाती। कंपनी के मुताबिक टैबलेट के रंग पैकिंग पर छपे अक्षरों के फॉन्ट फॉर्मूले की जानकारी और क्यूआर कोड का आकार असली पैकिंग से बिल्कुल अलग है। यहाँ तक कि लाइसेंस संख्या की कोलन स्थिति और आइटम कोड में भी गड़बड़ी मिली है। बैच नंबर जीटीएफ3302ए वाली इस दवा की एमआरपी 632 रुपए दर्ज है।
कानूनी रूप से जाली है ऐसी औषधि
ड्रग एक्ट 1940 की धारा 17 बी के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई औषधि खुद को किसी ऐसे निर्माता का उत्पाद बताती है जिसका वह वास्तव में नहीं है तो उसे स्यूरियस यानी जाली माना जाता है। सन फार्मा द्वारा इसे अपना उत्पाद न मानने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यह जाली दवा है भले ही इसमें सक्रिय तत्व मौजूद हों। कंपनी ने इस संबंध में लखनऊ प्रशासन को पत्र लिखकर पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने की मांग की है।
सरकारी लैब और अधिकारियों का तर्क
रायपुर की खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला की प्रभारी तृप्ति जैन का कहना है कि यदि टैबलेट में जो मानक होने चाहिए वे सही मिले होंगे इसलिए उसे लैब में पास किया गया होगा। उनका कहना है कि अगर निर्माता का नाम गलत है तो वह तकनीकी रूप से नकली है। वहीं रायगढ़ की ड्रग इंस्पेक्टर सविता रानी ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अब टैबलेट की गुणवत्ता की अंतिम जांच के लिए सैंपल सेंट्रल ड्रग लेबोरेटरी कोलकाता भेजा गया है जिसकी रिपोर्ट आना अभी बाकी है।
आंकड़ों में जांच की स्थिति
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच ड्रग विभाग द्वारा किए गए सर्वे में कुल 1107 सैंपल लिए गए। इनमें से 1054 सैंपल जांच में पास हुए जबकि 53 सैंपल फेल पाए गए। इसी तरह फूड विभाग की जांच में भी बड़ी संख्या में सैंपल लिए गए जिनमें से कई मानक पर खरे नहीं उतरे। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग को कोलकाता की रिपोर्ट का इंतजार है जिससे यह साफ हो सके कि इस दवा में मरीजों की जान बचाने वाले तत्व हैं या यह केवल
मिट्टी की गोली है।