CG | Fri, 07 August 2026

No Ad Available

छेरछेरा… छेरछेरा…’ की गूंज से गूंजा गरियाबंद,ढोल-नगाड़ों संग बच्चों ने निभाई लोक-परंपरा, घर-घर पहुंचा दान,पर्व में दिखी छत्तीसगढ़ी संस्कृति, समरसता और अपनत्व

03 Jan 2026 | WEENEWS DESK | 79 views
छेरछेरा… छेरछेरा…’ की गूंज से गूंजा गरियाबंद,ढोल-नगाड़ों संग बच्चों ने निभाई लोक-परंपरा, घर-घर पहुंचा दान,पर्व में दिखी छत्तीसगढ़ी संस्कृति, समरसता और अपनत्व

‘गरियाबंद।
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक छेरछेरा पर्व इस वर्ष भी पूरे उल्लास, श्रद्धा और सद्भाव के साथ मनाया जा रहा है। शहर से लेकर गांव तक इस पारंपरिक लोक-पर्व की रौनक देखते ही बन रही है। गरियाबंद में सुबह होते ही बच्चों की टोलियां “छेरछेरा… छेरछेरा…” की मधुर पुकार के साथ सड़कों, गलियों और मोहल्लों में निकल पड़ीं, जिससे पूरा वातावरण लोक-आनंद से भर उठा।

पुराना मंगल बाजार क्षेत्र में आज छेरछेरा पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिला, जहां कुछ बच्चे बाकायदा ढोल-नगाड़ों के साथ छेरछेरा मांगते नजर आए। बच्चे छत्तीसगढ़ी लोकगीत गाते हुए—
“छेरछेरा… कोठी के धान ला हेर-हेरा…”
की स्वर लहरियों के साथ घर-घर पहुंचे और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन किया।

बच्चों ने टोकरी, चुंगड़ी और थैलों में अन्न, धान और दान एकत्र किया। यह दृश्य केवल मांगने का नहीं, बल्कि दान, त्याग और आपसी प्रेम की भावना का सशक्त प्रतीक बन गया। गली-मोहल्लों में बुजुर्गों, महिलाओं और परिवारजनों ने बच्चों को धान, चावल, नकद राशि और मिठाइयाँ देकर उनका उत्साह बढ़ाया और इस लोक-पर्व को श्रद्धा के साथ निभाया।

ग्रामीण अंचलों के साथ-साथ शहरी परिवेश में भी छेरछेरा पर्व को लेकर खासा उत्साह नजर आया। आधुनिक जीवनशैली के बीच भी लोगों ने अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखते हुए इस परंपरा को ससम्मान आगे बढ़ाया। यह पर्व केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बुजुर्गों और युवाओं ने भी सहभागिता निभाकर सामाजिक एकता और आपसी अपनत्व का संदेश दिया।

उल्लेखनीय है कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का अत्यंत प्राचीन लोक-पर्व है, जो दान, समरसता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व नई पीढ़ी को संस्कार, परंपरा और सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है और यह सिद्ध करता है कि छत्तीसगढ़ की लोक-परंपराएं आज भी जीवंत और सशक्त हैं।

धरमीन बाई सिन्हा (बुजुर्ग महिला) ने कहा “हमारे जमाने से छेरछेरा मनाते आ रहे हैं। यह पर्व केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज को जोड़ने वाला है। जब बच्चे छेरछेरा मांगने आते हैं तो मन अपने आप खुश हो जाता है। अन्न और दान देना पुण्य का काम माना जाता है। इससे आपसी प्रेम बढ़ता है और समाज में बराबरी की भावना आती है। आज की पीढ़ी भी इस परंपरा को निभा रही है, यह देखकर बहुत संतोष होता है। छेरछेरा हमें सिखाता है कि जितना हो सके, दूसरों के साथ बाँटकर चलें।”

लता सिन्हा ने कहा —

“छेरछेरा छत्तीसगढ़ की आत्मा है। इस दिन अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं रहता, सभी एक-दूसरे को दान देते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। बच्चों की आवाज़ सुनकर पुराने दिन याद आ जाते हैं। ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों के साथ जब बच्चे आते हैं, तो पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है। यह पर्व हमें हमारी संस्कृति से जोड़े रखता है और आने वाली पीढ़ी को संस्कार देने का काम करता है। ऐसी परंपराएं कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।”

WEENEWS DESK
WEENEWS DESK

Latest

Join WhatsApp


❌ No active feeds found.