बिलासपुर l सियासत के अखाड़े में इन दिनों जिले की एक विधानसभा क्षेत्र की चर्चा जोरों पर है। किस्सा एक ऐसे 'पुराने चावल' का है, जिनकी सत्ता की भूख और कुर्सी का मोह किसी भी सूरत में कम होने का नाम नहीं ले रहा। हाल ही में इस सीट पर एक ऐसा दिलचस्प वाकया हुआ, जिसने पूरे जिले के सियासी गलियारों में कानाफूसी तेज कर दी है।
हुआ यूं कि इलाके की एक तेज-तर्रार और महत्वकांक्षी निर्वाचित नेत्री ने अचानक अपना जनसंपर्क बढ़ाना शुरू कर दिया। गांव-गांव जाकर जनता के बीच उनकी बढ़ती पैठ और लोकप्रियता को देखकर पुराने चावल वाले नेता जी के माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगीं। अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन खिसकती देख नेता जी ने तुरंत पैंतरा बदला। उन्होंने नेत्री जी को शिष्टाचार के बहाने बुलाया और बड़ी ही चाशनी में लपेट कर एक मीठी नसीहत दे डाली— आपको क्षेत्र में इतनी भागदौड़ करने की भला क्या आवश्यकता है? आप आराम कीजिए, आपका क्षेत्र मैं देख लूंगा।
सुनने में यह वाक्य भले ही किसी बड़े बुजुर्ग का स्नेह या आशीर्वाद लगे, लेकिन सियासत की कुटिल डिक्शनरी में इसका सीधा अर्थ है— 'मेरे इलाके में सेंधमारी की जुर्रत मत करो।' दरअसल, अपनी सुरक्षित सीट को अचानक खतरे में देखकर नेता जी की धड़कनें बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रही हैं। उन्हें हर पल यह खौफ सता रहा है कि कहीं यह नई नेत्री उनका पक्का सियासी पत्ता न साफ कर दे।
अब एक सवाल उठता है कि आखिर नेता जी अपनी सीट क्यों नहीं छोड़ना चाहते? इसका जवाब बहुत सीधा और कड़वा है। सियासत में कुर्सी कोई मामूली फर्नीचर नहीं, बल्कि वह जादुई पारस पत्थर है जो किसी भी आम आदमी को सत्ता का बेताज बादशाह बना देता है। दशकों से इस सीट पर कुंडली मारकर बैठे नेता जी ने पूरे इलाके को अपनी निजी जागीर समझ लिया है। सत्ता का भारी रसूख, ठेके-पट्टे का खेल, और जी-हुजूरी करने वाले समर्थकों की फौज ये सब कुर्सी छिनते ही छूमंतर हो जाते हैं। भला इस तिलिस्म को कोई स्वेच्छा से क्यों तोड़ना चाहेगा?
चौपालों पर लोग पूछते हैं कि आखिर यह नेता जी हैं कौन? सीधे नाम लेना तो मुनासिब नहीं, लेकिन इशारों में समझ लीजिए कि ये सियासत के वो 'पुराने चावल' हैं जो पकने में भले ही समय लेते हों, लेकिन स्वाद और सियासत दोनों में अपना एकाधिकार बनाए रखते हैं।
क्या यही कारण है कि इस विधानसभा क्षेत्र में कोई छोटा नेता उभर नहीं पा रहा? सौ फीसदी सच! नेता जी उस विशाल बरगद के पेड़ की तरह हो गए हैं, जिसकी घनी और अंधेरी छांव में कोई नया पौधा पनप ही नहीं सकता। जो भी युवा या उभरता हुआ छोटा नेता सिर उठाने की हिमाकत करता है, नेता जी अपनी कूटनीति की कैंची से बड़ी सफाई से उसके पर कतर देते हैं। क्षेत्र मैं देख लूंगा वाला यह ताजा बयान इसी वर्चस्ववादी राजनीति का एक छोटा सा ट्रेलर भर है। अब देखना यह है कि नेत्री जी इस चक्रव्यूह को कैसे तोड़ती हैं। कमान से तीर अभी और भी निकलेंगे!