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महाप्रभु लौटे अपने घर, झूम उठा गरियाबंद बाहुड़ा रथयात्रा में उमड़ा हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब,जय जगन्नाथ के जयघोष से भक्तिमय हुआ पूरा नगर

25 Jul 2026 | WEENEWS DESK | 5 views
महाप्रभु लौटे अपने घर, झूम उठा गरियाबंद बाहुड़ा रथयात्रा में उमड़ा हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब,जय जगन्नाथ के जयघोष से भक्तिमय हुआ पूरा नगर

गरियाबंद। भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा रथयात्रा शुक्रवार को गरियाबंद में पूरे धार्मिक उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक वैभव के साथ संपन्न हुई। 24 दिनों तक चले धार्मिक अनुष्ठानों के समापन पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने श्रीमंदिर लौटे। पूरे नगर में “जय जगन्नाथ” के जयघोष गूंजते रहे और हजारों श्रद्धालु महाप्रभु के दर्शन के लिए उमड़ पड़े।

शुक्रवार शाम गुंडिचा (शीतला) मंदिर से भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा रथयात्रा विधिवत प्रारंभ हुई। रथ यादवपारा, बजरंग चौक, तिरंगा चौक, संतोषी मंदिर और गौरव पथ होते हुए राम-जानकी मंदिर पहुंचा। यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने रथ का स्वागत किया, पुष्पवर्षा की और भगवान के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना। रथयात्रा के दौरान समिति की ओर से श्रद्धालुओं के लिए हलवा-पूरी महाप्रसाद का वितरण भी किया गया।

सुबह से ही जगन्नाथ मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, मंगल आरती, भजन-कीर्तन और महाप्रसाद वितरण का आयोजन हुआ। भगवान के श्रीमंदिर लौटने की खुशी में पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।

धार्मिक परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का 108 कलशों के पवित्र जल, चंदन और औषधीय द्रव्यों से देवस्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान 16 दिनों के लिए अनासर (एकांतवास) में रहते हैं। इस अवधि में उनके दर्शन बंद रहते हैं और वैदिक परंपरा के अनुसार औषधीय उपचार किया जाता है। अनासर के बाद नेत्रोत्सव में भगवान के नेत्रों का पुनः अंकन किया जाता है, जिसके पश्चात आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों विग्रह भव्य रथों में सवार होकर मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) के लिए प्रस्थान करते हैं। वहां आठ दिनों के प्रवास के बाद बाहुड़ा रथयात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं।

माता लक्ष्मी की मान-मनौव्वल की अनोखी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

बाहुड़ा रथयात्रा के दौरान जब भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर के मुख्य द्वार पहुंचे तो परंपरा के अनुसार उन्हें कुछ समय के लिए मंदिर के बाहर ही प्रतीक्षा करनी पड़ी। मंदिर के पुजारी ने बताया कि रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को साथ लेकर मौसीबाड़ी नहीं गए थे। इसी कारण माता लक्ष्मी प्रतीकात्मक रूप से नाराज होकर मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं। लगभग 15 मिनट तक भगवान के प्रतीकात्मक इंतजार के बाद विधि-विधान, पूजा-अर्चना और मान-मनौव्वल की रस्म पूरी की जाती है। इसके पश्चात माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर भगवान का श्रीमंदिर में पुनः स्वागत करती हैं। यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही।

बाहुड़ा रथयात्रा के सफल आयोजन के साथ गरियाबंद में भगवान जगन्नाथ महाप्रभु के 24 दिवसीय धार्मिक महोत्सव का श्रद्धा, आस्था और उल्लासपूर्ण वातावरण में समापन हुआ। पूरे आयोजन के दौरान भक्तों में गहरा उत्साह देखने को मिला और नगर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा।

WEENEWS DESK
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