CG | Tue, 29 September 2026

No Ad Available

मां के साथ ईंट-गारा उठाया, सरकारी नौकरी छोड़ी और खड़ी कर दीं कई यूनिवर्सिटी: 'हमर पहुना' में कुलपति डॉ. तिवारी की अनकही कहानी

28 Sep 2026 | WEENEWS DESK | 850 views
मां के साथ ईंट-गारा उठाया, सरकारी नौकरी छोड़ी और खड़ी कर दीं कई यूनिवर्सिटी: 'हमर पहुना' में कुलपति डॉ. तिवारी की अनकही कहानी

बिलासपुर। बिलासपुर प्रेस क्लब का ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम। सामने बैठे थे महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (MUMT) के कुलपति डॉ. नरेश तिवारी। माहौल तब थोड़ा संजीदा हो गया, जब उन्होंने जिंदगी के पन्ने पलटे। मात्र छह साल की उम्र में सिर से पिता का साया उठ गया था। मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं, तो पेट पालने के लिए मजदूरी का रास्ता चुना। मजदूरी की इस भट्टी में उन्होंने बच्चों की पढ़ाई को कभी जलने नहीं दिया। खुद डॉ. तिवारी ने बचपन में मजदूरी की और सरकारी वजीफे (स्कॉलरशिप) के दम पर छठवीं कक्षा से लेकर पीएचडी तक का रास्ता नाप लिया।

बुंदेलखंड के सागर जिले की माटी में जन्मे डॉ. तिवारी मानते हैं कि अगर डॉ. हरिसिंह गौर ने अपनी गाढ़ी कमाई से सागर में यूनिवर्सिटी नहीं बनाई होती, तो शायद वे कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जो इंसान की तकदीर बदलती है। पढ़ाई के बाद एमपी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में वैज्ञानिक की कुर्सी संभाली।

खदानों के नुकसान का तैयार किया था कच्चा-चिट्ठा

बतौर वैज्ञानिक उनका सबसे ज्यादा पसीना छत्तीसगढ़ में ही बहा। भूगोल और भौगोलिक संरचना समझने बिलासपुर के गांव-गांव की खाक छानी। कोरबा की खदानों से पर्यावरण को हो रहे नुकसान की जमीनी हकीकत परखी। खनन के बाद कंपनियों ने जो पौधे लगाए और जो सुधार के दावे किए, उसकी असलियत भी सामने रखी। जबलपुर और बस्तर में खनिजों की खोजबीन के कामों में भी पसीना बहाया

दिमाग में था कीड़ा, इसलिए छोड़ दी अफसरशाही

सब कुछ बढ़िया चल रहा था। लेकिन दिमाग में सवाल हमेशा कौंधता था कि उनके जाने के बाद उनका काम कौन आगे बढ़ाएगा। इसी उधेड़बुन में 2008 में सरकारी नौकरी से वीआरएस ले लिया और शिक्षा की लाइन पकड़ ली। इससे पहले 2003 में वे सीवी रमन यूनिवर्सिटी में प्रतिनियुक्ति पर भी आए थे, जहां उच्च शिक्षा की कमियां उन्होंने बहुत करीब से देखी थीं।

कॉलेजों में गैरहाजिरी की बीमारी पर उन्होंने गहरा प्रहार किया। ओरिएंटल और बंसल ग्रुप में जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने तगड़ा एक्शन लिया। जब 238 छात्रों की अटेंडेंस कम मिली, तो किसी की पैरवी नहीं सुनी और सबको नियमों के तहत डिटेन कर दिया। भारी दबाव आया, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। इसी कड़क रवैये का नतीजा था कि बाद में कॉलेजों का अनुशासन पटरी पर लौट आया।

अब तक कई यूनिवर्सिटी खड़ी करने में झोंकी ताकत

अब तक वे ओरिएंटल, श्याम बिहारी, मध्य छत्तीसगढ़, श्रीकृष्ण और आर्या यूनिवर्सिटी की नींव रखने में बतौर संस्थापक सलाहकार अपनी ताकत झोंक चुके हैं। बिलासपुर और छविंद्र यूनिवर्सिटी में

महर्षि यूनिवर्सिटी में आए उन्हें करीब छह महीने हुए हैं, लेकिन काम की रफ्तार काफी तेज है। इतने कम समय में 13 अलग-अलग संस्थाओं से एमओयू (करार) साइन हो चुके हैं। इनमें बीएनआई और नई दिल्ली का जनजातीय अनुसंधान एवं विज्ञान केंद्र शामिल है। नवाचार और जनजातीय समाज के मुद्दों पर काम चल रहा है।

यूके में दो पेटेंट भी दर्ज करा लिए हैं। इनमें पहला कंप्यूटर डिवाइस और दूसरा एआई पर आधारित डिवाइस है। इन पर आगे की रिसर्च जारी है। इस बीच यूनिवर्सिटी के मास्टरों ने 30 से ज्यादा रिसर्च पेपर और 13 से ज्यादा किताबें छाप दी हैं।

डॉ. तिवारी का विजन क्लीयर है। महर्षि यूनिवर्सिटी सिर्फ किताबी या पश्चिमी पढ़ाई का अड्डा नहीं बनेगी। यहां आधुनिक पढ़ाई के साथ वेद, योग, ध्यान और भारतीय ज्ञान परंपरा की घुट्टी भी पिलाई जा रही है। महर्षि महेश योगी ने जो ज्ञान 117 देशों तक फैलाया, उसी रास्ते पर अब यह संस्था कदम बढ़ा रही है।

ि भी रहे।

।



WEENEWS DESK
WEENEWS DESK

Join WhatsApp


❌ No active feeds found.