बिलासपुर । सियासत की बिसात पर कब कौन सा मोहरा पिट जाए और हवा का रुख किस तरफ मुड़ जाए, यह कोई नहीं जानता। विधानसभा के सियासी गलियारों में इन दिनों बस एक ही चर्चा का बाजार सबसे ज्यादा गर्म है— 'पवन' का जाना। जी हां, जैसे ही पवन ने अपनी तेज हवाओं के साथ यहां से अपनी विदाई ली है, कई स्वयंभू दिग्गजों के तोते भी साथ में फुर्र से उड़ गए हैं। जो नेता कल तक इसी 'पवन वेग' के सहारे अपनी राजनीतिक नैया पार लगाने का मुंगेरीलाली सपना देख रहे थे, आज वो गहरे सदमे में हैं। वहीं, जो लोग इस कृत्रिम वेग की आंधी से परेशान थे, उनके चेहरों पर अब सावन की हरियाली लौट आई है और वे राहत की सांस ले रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बुरा हाल तो उस नेताजी का है, जो खुद को अभी से 'भावी माननीय' मानकर चल रहे थे। चुनाव का बिगुल भले ही अभी न बजा हो, लेकिन नेताजी का रुतबा और गुरूर ऐसा था मानो उनके शपथ ग्रहण की तारीख बस मुकर्रर ही हो गई हो। पवन की हवा के साये में नेताजी के पैर जमीन पर टिक ही नहीं रहे थे। चाटुकारों की फौज उन्हें एडवांस में 'विधायक जी' कहकर दंडवत हो रही थी। लेकिन अब?
अब नेताजी भारी टेंशन में हैं। बंद कमरों में पसीने पोंछते हुए उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जिस बैसाखी के सहारे वे दौड़ने की तैयारी कर रहे थे, उसके अचानक खिसक जाने के बाद अब वे अपने दम पर जनता के बीच खड़े कैसे होंगे।
ऐसे नेता जो वैचारिक निष्ठा का फर्जी मुखौटा ओढ़े घूम रहे थे, उनकी हालत खासी खराब है। कार्यकर्ताओं से लेकर जनता तक सबको पता था कि मुखौटा सिर्फ और सिर्फ सत्ता की मलाई चाटने की जुगत भर है। पवन की सरपरस्ती में उनका यह वैचारिक फर्जीवाड़ा खूब फल-फूल रहा था। लेकिन अब यह मुखौटा बुरी तरह दरकने लगा है। मुखौटे के पीछे का अवसरवादी चेहरा बेनकाब होने के डर से नेताजी की नींद उड़ी हुई है।
कहते हैं न कि राजनीति में कर्मों का फल सूत समेत यहीं मिलता है, यह बात एक बार फिर साबित हो गई है।
पावर का तिलिस्म हमेशा नहीं रहता वक्त का पहिया घूमता है, वो उपेक्षित नेता बेहद खुश हैं, जो कल तक घुट-घुट कर राजनीति करने को मजबूर थे। जिले की
प्रदेश स्तर पर भी नए राजनीतिक समीकरण आकार लेने लगे हैं। शतरंज की बिसात फिर से बिछ रही है और मोहरे नई चाल चलने को बेताब हैं। जो कल तक राजा थे, वे आज प्यादे नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर, 'पवन' के जाने से सियासत की हवा पूरी तरह बदल चुकी है। अब देखना यह है कि इस नई बयार में कौन अपनी पतंग उड़ा पाता है और कौन औंधे मुंह गिरता है। कमान के तीर अभी और भी निकलेंगे, बस सही निशाने का इंतजार है!